Supreme Court CJI Cockroach Remark: सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य न्यायाधीश की ‘कॉकरोच’ टिप्पणी के कथित गलत इस्तेमाल और उसे व्यावसायिक लाभ के लिए इस्तेमाल किए जाने के आरोपों से जुड़ी जनहित याचिका पर केंद्र सरकार और सीबीआई से जवाब मांगा है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि अदालत की वर्चुअल कार्यवाही के एक हिस्से को संदर्भ से अलग करके एडिट किया गया और बाद में उसका इस्तेमाल न्यायपालिका की छवि प्रभावित करने तथा व्यावसायिक लाभ लेने के लिए किया गया।
मंगलवार को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की पीठ के सामने करीब आधे घंटे तक सुनवाई हुई। याचिकाकर्ता और उनके वकील राजा चौधरी ने अदालत के सामने इस पूरे मामले की जांच की मांग रखी।
क्या है CJI की ‘कॉकरोच’ टिप्पणी का मामला?
मामला 15 मई को हुई एक न्यायिक कार्यवाही से जुड़ा है। याचिकाकर्ता के अनुसार, उस सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश ने ‘कॉकरोच’ शब्द का इस्तेमाल एक अलग संदर्भ में किया था।
याचिकाकर्ता का दावा है कि अदालत की कार्यवाही के वीडियो से एक खास हिस्से को चुनकर एडिट किया गया और उसे सोशल मीडिया पर इस तरह पेश किया गया, जिससे मूल टिप्पणी का संदर्भ और अर्थ बदल गया।
उनके मुताबिक, इस तरह के एडिटेड क्लिप का इस्तेमाल न्यायपालिका की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने और कमर्शियल फायदा उठाने के लिए किया गया।
सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता ने क्या कहा?
सीजेआई सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ के सामने हुई सुनवाई में याचिकाकर्ता और वकील राजा चौधरी ने इस मामले की गहराई से जांच की मांग की।
उन्होंने कहा कि यह पता लगाया जाना चाहिए कि 15 मई की न्यायिक कार्यवाही के दौरान अलग संदर्भ में कही गई ‘कॉकरोच’ टिप्पणी को कैसे चुना गया, एडिट किया गया और फिर उसका इस्तेमाल किया गया।
याचिकाकर्ता के मुताबिक, इससे न्यायिक गरिमा और संस्थागत अखंडता पर असर पड़ सकता है।
‘CJI की टिप्पणी को गलत संदर्भ में पेश किया गया’
याचिकाकर्ता ने संजय दुबे बनाम दिल्ली हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल मामले में 15 मई को हुई सुनवाई का हवाला दिया।
उनका कहना था कि CJI ने ‘कॉकरोच’ वाली टिप्पणी कथित फर्जी वकीलों के संदर्भ में की थी। इस दौरान अदालत की प्रक्रिया के दुरुपयोग और पेशेवर मानकों में गिरावट को लेकर चिंता व्यक्त की गई थी।
याचिकाकर्ता का आरोप है कि बाद में इसी टिप्पणी के एक हिस्से को अलग करके सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया और मूल संदर्भ को हटा दिया गया।
अदालत की कार्यवाही के एडिटेड क्लिप पर सवाल
याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में दावा किया कि 15 मई के बाद चुनिंदा तरीके से एडिट किए गए अदालती कार्यवाही के वीडियो क्लिप में बढ़ोतरी हुई है।
उनका आरोप है कि कोर्ट की सुनवाई के दौरान जजों की टिप्पणियों को संदर्भ से अलग करके मीम्स और सोशल मीडिया कंटेंट में बदला जा रहा है।
याचिकाकर्ता के अनुसार, इस तरह की सामग्री को सोशल मीडिया पर प्रसारित करने का उद्देश्य केवल राजनीतिक या सामाजिक प्रतिक्रिया पैदा करना नहीं बल्कि कुछ मामलों में व्यावसायिक लाभ हासिल करना भी हो सकता है।
CJI की टिप्पणी से ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ का क्या संबंध है?
CJI की ‘कॉकरोच’ टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP नाम चर्चा में आया। स्रोत के अनुसार, इसी संगठन ने हाल में NEET पेपर लीक के खिलाफ Gen Z विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लिया था।
अब इस संगठन और CJI की टिप्पणी के संदर्भ में एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें कथित तौर पर अदालत की टिप्पणी के व्यावसायिक इस्तेमाल और उसके संदर्भ से छेड़छाड़ की जांच की मांग की गई है।
याचिका में किन लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग?
याचिकाकर्ता ने अधिकारियों से उन लोगों और संस्थाओं के खिलाफ कानून के अनुसार जांच और कार्रवाई की मांग की है, जो अदालत में कही गई बातों या उदाहरणों का कथित तौर पर व्यावसायिक फायदा उठाने में शामिल हैं।
याचिका में ट्रेडमार्क के कथित इस्तेमाल, पैसे कमाने के लिए सामग्री फैलाने और बिना अनुमति व्यावसायिक उपयोग जैसे पहलुओं की जांच की मांग भी रखी गई है।
हालांकि, याचिकाकर्ता ने यह भी स्पष्ट किया कि संवैधानिक दायरे में निष्पक्ष आलोचना, लोकतांत्रिक असहमति, व्यंग्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान किया जाना चाहिए, बशर्ते इससे न्यायिक संस्था की गरिमा प्रभावित न हो।
याचिकाकर्ता ने सोशल मीडिया को लेकर क्या चिंता जताई?
याचिका में सोशल मीडिया पर अदालती टिप्पणियों के चुनिंदा हिस्सों को वायरल करने की प्रवृत्ति पर चिंता जताई गई है।
याचिकाकर्ता का कहना है कि अगर किसी न्यायाधीश की टिप्पणी को उसके मूल संदर्भ से अलग कर दिया जाए, तो आम लोगों तक उस सुनवाई की गलत तस्वीर पहुंच सकती है।
उनके अनुसार, ऐसी सामग्री से न्यायपालिका और न्यायाधीशों की छवि प्रभावित हो सकती है तथा लोगों के बीच न्यायिक संस्थानों को लेकर गलत धारणा बन सकती है।
क्या हर आलोचना पर रोक लगाने की मांग है?
याचिका में ऐसा नहीं कहा गया है कि अदालत या न्यायाधीशों की हर तरह की आलोचना पर रोक लगाई जाए।
इसके बजाय याचिकाकर्ता ने निष्पक्ष आलोचना, लोकतांत्रिक असहमति, व्यंग्य और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संवैधानिक अधिकारों के दायरे में स्वीकार करने की बात कही है।
मुख्य सवाल यह है कि अदालत की टिप्पणी को जानबूझकर संदर्भ से अलग करके पेश किया गया या नहीं और यदि ऐसा हुआ तो क्या उसका व्यावसायिक इस्तेमाल भी किया गया।
अब केंद्र और CBI को क्या करना होगा?
सुप्रीम कोर्ट ने इस PIL पर केंद्र सरकार और CBI से जवाब मांगा है। आगे की सुनवाई में सरकार और जांच एजेंसी का पक्ष सामने आने के बाद इस मामले की दिशा ज्यादा स्पष्ट हो सकती है।
फिलहाल अदालत की ओर से जवाब मांगा जाना यह दर्शाता है कि याचिका में उठाए गए मुद्दों पर न्यायालय ने संबंधित पक्षों से प्रतिक्रिया लेना उचित समझा है।
क्यों महत्वपूर्ण है यह मामला?
यह मामला केवल एक ‘कॉकरोच’ टिप्पणी तक सीमित नहीं है। इसके केंद्र में अदालत की लाइव या वर्चुअल कार्यवाही से जुड़े वीडियो क्लिप, सोशल मीडिया पर उनके इस्तेमाल और न्यायिक टिप्पणियों के संदर्भ को बनाए रखने का सवाल है।
अगर अदालती टिप्पणियों को संदर्भ से अलग करके वायरल किया जाता है, तो उससे किसी भी न्यायिक कार्यवाही की सार्वजनिक समझ प्रभावित हो सकती है। वहीं दूसरी तरफ सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफॉर्म पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा आलोचना का अधिकार भी महत्वपूर्ण है।
इसी संतुलन के बीच अब सुप्रीम कोर्ट के सामने यह मामला है। केंद्र सरकार और CBI के जवाब के बाद यह स्पष्ट हो सकता है कि कथित एडिटिंग और व्यावसायिक इस्तेमाल के आरोपों पर आगे क्या कार्रवाई होती है।










