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RSS पर बैन की मांग: मोहन भागवत के अमेरिका दौरे से पहले USCIRF का बड़ा बयान

On: August 20, 2026 3:47 AM
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RSS पर बैन
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वॉशिंगटन: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) को लेकर अमेरिका में एक नया विवाद सामने आया है। अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग USCIRF से जुड़े अधिकारियों ने अमेरिकी सरकार से RSS नेताओं के साथ उच्चस्तरीय बैठकों और राजनयिक शिष्टाचार से बचने की मांग की है। यह बयान RSS प्रमुख मोहन भागवत के प्रस्तावित अमेरिका दौरे से कुछ दिन पहले आया है।

नवभारत टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, USCIRF के अध्यक्ष आसिफ महमूद ने RSS को ऐसा संगठन बताया जिसके सहयोगी संगठनों पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमलों के आरोप हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के RSS से जुड़े होने का भी जिक्र किया।

USCIRF ने RSS पर क्या आरोप लगाए?

USCIRF अधिकारियों ने RSS और उसके सहयोगी संगठनों को लेकर गंभीर आरोप लगाए हैं। USCIRF के प्रमुख आसिफ महमूद ने दावा किया कि RSS एक ऐसा अंब्रेला संगठन है जिसके सहयोगी संगठनों ने भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों, जिनमें ईसाई और मुस्लिम शामिल हैं, के खिलाफ हमलों में भूमिका निभाई है।

उन्होंने इसी संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी उल्लेख किया और कहा कि वह RSS के सदस्य हैं।

हालांकि, ये USCIRF अधिकारियों के आरोप और बयान हैं। इन्हें स्वतंत्र रूप से स्थापित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करने के बजाय संबंधित अधिकारियों के दावे के तौर पर देखा जाना चाहिए।

RSS पर प्रतिबंध लगाने की मांग

USCIRF कमिश्नर जीन मिल्स ने अमेरिकी सरकार से RSS के उन सदस्यों पर प्रतिबंध लगाने की मांग की, जिन्हें धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार पाया जाए।

उन्होंने यह भी कहा कि RSS नेताओं के साथ उच्चस्तरीय बैठकें या राजनयिक शिष्टाचार नहीं किया जाना चाहिए, भले ही वे भारत सरकार से जुड़े हों।

यानी USCIRF से जुड़े अधिकारियों की मांग केवल RSS पर टिप्पणी तक सीमित नहीं है, बल्कि वे अमेरिकी सरकार की ओर से RSS नेताओं के साथ आधिकारिक व्यवहार को लेकर भी कड़ा रुख अपनाने की बात कर रहे हैं।

मोहन भागवत का अमेरिका दौरा क्यों चर्चा में है?

यह पूरा विवाद ऐसे समय सामने आया है जब RSS प्रमुख मोहन भागवत के अमेरिका दौरे की योजना है।

रिपोर्ट के मुताबिक, भागवत 29 अगस्त 2026 को न्यूयॉर्क में आयोजित होने वाले Universal Oneness Celebrations कार्यक्रम में शामिल होने वाले हैं। कार्यक्रम का आयोजन अमेरिकन हिंदूज फॉर एंगेजमेंट एंड डायलॉग द्वारा किया जाना है।

इसी प्रस्तावित दौरे से पहले USCIRF अधिकारियों के बयान ने राजनीतिक और सामाजिक बहस को तेज कर दिया है।

हिंदूज फॉर ह्यूमन राइट्स ने भी किया विरोध

USCIRF के अलावा मानवाधिकार संगठन Hindus for Human Rights ने भी मोहन भागवत के अमेरिका दौरे का विरोध किया है।

संगठन ने आरोप लगाया कि भागवत का दौरा RSS नेटवर्क से जुड़े मुसलमानों और ईसाइयों के खिलाफ हिंसा के आरोपों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

संगठन ने सोशल मीडिया पर कहा कि एकता का जश्न धार्मिक श्रेष्ठता की राजनीति को छिपा नहीं सकता।

USCIRF क्या है?

USCIRF अमेरिका की एक धार्मिक स्वतंत्रता सलाहकार संस्था है, जो दुनिया के अलग-अलग देशों में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति पर रिपोर्ट और सिफारिशें देती है।

इस मामले में USCIRF से जुड़े अधिकारियों ने भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति और RSS की भूमिका को लेकर अमेरिकी सरकार से कड़ा रुख अपनाने की मांग की है।

हालांकि, किसी अमेरिकी सलाहकार संस्था की सिफारिश अपने आप अमेरिकी सरकार की आधिकारिक नीति या निर्णय नहीं बन जाती। इसलिए USCIRF के बयान और अमेरिकी सरकार की औपचारिक नीति को अलग-अलग समझना जरूरी है।

PM मोदी के RSS से संबंध का भी जिक्र

USCIRF अध्यक्ष आसिफ महमूद ने अपने बयान में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के RSS से संबंधों का जिक्र किया।

उन्होंने RSS को एक बड़े संगठनात्मक नेटवर्क के रूप में पेश करते हुए उसके सहयोगी संगठनों पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हमलों के आरोप लगाए।

इस बयान के बाद चर्चा केवल मोहन भागवत के अमेरिका दौरे तक सीमित नहीं रही, बल्कि भारत में RSS और राजनीतिक नेतृत्व के संबंधों को लेकर भी बहस तेज होने की संभावना है।

क्या RSS पर वास्तव में अमेरिका में बैन लग गया है?

नहीं।

उपलब्ध रिपोर्ट में RSS पर अमेरिका की ओर से कोई प्रतिबंध लगाए जाने की जानकारी नहीं दी गई है। खबर का मुख्य विषय USCIRF अधिकारियों द्वारा अमेरिकी सरकार से RSS पर कार्रवाई और उसके नेताओं के साथ आधिकारिक व्यवहार सीमित करने की मांग है।

इसलिए ‘RSS पर बैन’ को वर्तमान में मांग या प्रस्ताव के रूप में समझना चाहिए, लागू प्रतिबंध के रूप में नहीं।

भारत-अमेरिका संबंधों पर क्या असर पड़ सकता है?

USCIRF के बयान से भारत-अमेरिका संबंधों पर राजनीतिक बहस जरूर तेज हो सकती है। खासकर इसलिए क्योंकि यह बयान मोहन भागवत के अमेरिका दौरे से ठीक पहले आया है।

हालांकि, इस एक बयान के आधार पर भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों की दिशा को लेकर कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। इसके लिए अमेरिकी सरकार की आधिकारिक प्रतिक्रिया और आगे के कूटनीतिक घटनाक्रम को देखना जरूरी होगा।

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