जंतर-मंतर पुलिस कार्रवाई: दिल्ली में 20 जुलाई को हुए प्रदर्शन के दौरान पुलिस की कार्रवाई अब भी सवालों के घेरे में है। प्रदर्शनकारियों को संसद की ओर जाने से रोकने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया, आंसू गैस का इस्तेमाल किया और भीड़ को पीछे हटाने की कोशिश की। इस दौरान पुलिस पर पथराव के आरोप भी सामने आए।
हालांकि प्रदर्शन समाप्त हो चुका है, लेकिन पैलेट गन के कथित इस्तेमाल, लाठीचार्ज के तरीके, फेस रिकग्निशन तकनीक और पुलिस बल के अनुपात को लेकर बहस जारी है।
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, कम से कम चार प्रदर्शनकारियों का अस्पताल में इलाज हुआ और विशेषज्ञों ने उनकी चोटों को पैलेट गन से होने वाली चोटों जैसा बताया। दूसरी ओर, दिल्ली पुलिस ने पैलेट गन के इस्तेमाल से इनकार किया है।
जंतर-मंतर पर 20 जुलाई को क्या हुआ?
20 जुलाई को प्रदर्शनकारी संसद की ओर मार्च कर रहे थे। पुलिस ने उन्हें आगे बढ़ने से रोकने के लिए बैरिकेड लगाए थे।
पुलिस का कहना है कि प्रदर्शनकारी तय प्रतिबंधों का उल्लंघन कर रहे थे और बैरिकेड तोड़कर संसद की ओर बढ़ने की कोशिश कर रहे थे। पुलिस ने संसद सत्र के दौरान सुरक्षा और कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई को जरूरी बताया।
प्रदर्शन के दौरान लाठीचार्ज और आंसू गैस के इस्तेमाल के साथ पुलिसकर्मियों पर पथराव की तस्वीरें और वीडियो भी सामने आए।
यही वजह है कि अब सवाल केवल प्रदर्शनकारियों के व्यवहार पर नहीं, बल्कि पुलिस द्वारा इस्तेमाल किए गए बल की मात्रा और तरीके पर भी उठ रहे हैं।
क्या प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन चली थी?
इस पूरे मामले में सबसे गंभीर सवाल पैलेट गन को लेकर है।
रिपोर्ट के मुताबिक, कम से कम चार ऐसे मामले सामने आए जिनमें प्रदर्शनकारियों को अस्पताल में इलाज कराना पड़ा। विशेषज्ञों ने उनकी चोटों को पैलेट गन से होने वाले घाव जैसा बताया।
हालांकि दिल्ली पुलिस ने पैलेट गन इस्तेमाल करने से इनकार किया है।
मीडिया रिपोर्टों में संसद मार्ग थाने की जनरल डायरी में दर्ज एक एंट्री का भी जिक्र किया गया है। इसके अनुसार रैपिड एक्शन फोर्स यानी RAF ने एक वरिष्ठ अधिकारी के निर्देश पर एंटी-रायट गन से दो राउंड फायर किए थे।
इस वजह से पैलेट गन के कथित इस्तेमाल की जांच और जवाबदेही को लेकर सवाल और गंभीर हो गए हैं।
बिहार में AK-47 वाला वीडियो क्यों चर्चा में आया?
दिल्ली के घटनाक्रम के बीच बिहार के सीवान से सामने आए एक वीडियो ने भी पुलिस कार्रवाई पर बहस को तेज कर दिया।
वीडियो में बिहार पुलिस का एक सिपाही छात्र प्रदर्शनकारियों की ओर AK-47 ताने दिखाई दिया। वीडियो वायरल होने के बाद संबंधित पुलिसकर्मी को निलंबित कर दिया गया।
इस घटना ने पुलिस बल द्वारा प्रदर्शनकारियों से निपटने के तरीकों को लेकर देशभर में सवाल खड़े किए।
पूर्व IPS अधिकारी ने पुलिस कार्रवाई पर क्या कहा?
रिटायर्ड IPS अधिकारी और उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक विभूति नारायण राय ने 20 जुलाई की पुलिस कार्रवाई पर चिंता जताई।
उन्होंने कहा कि दिल्ली जैसे शहर में प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन के इस्तेमाल की उन्होंने कल्पना नहीं की थी।
उन्होंने पुलिस की तैयारी और बल प्रयोग के तरीके पर भी सवाल उठाए। उनके मुताबिक किसी बड़े प्रदर्शन से पहले पुलिस के पास प्रदर्शनकारियों की संभावित संख्या, उनके आने-जाने के रास्तों और संभावित परिस्थितियों की पर्याप्त जानकारी होनी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा कि प्रदर्शन में बड़ी संख्या में युवा और छात्र मौजूद थे, इसलिए पुलिस को ज्यादा संयम बरतने की जरूरत थी।
पुलिस को बल प्रयोग कब करना चाहिए?
पूर्व IPS अधिकारी के अनुसार पेशेवर पुलिस बल को भीड़ नियंत्रित करने के लिए एक तय प्रक्रिया का पालन करना चाहिए।
उनके मुताबिक सबसे पहले प्रदर्शन को गैरकानूनी घोषित करने और लोगों को वहां से हटने के लिए कहने जैसे कदम उठाए जाने चाहिए। इसके बाद जरूरत पड़ने पर पानी की बौछार, आंसू गैस और अन्य गैर-घातक उपायों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
उन्होंने पैलेट गन के इस्तेमाल को अनुचित बताया और कहा कि बल प्रयोग केवल उतना ही होना चाहिए जितना स्थिति को नियंत्रित करने के लिए जरूरी हो।
पुलिस के पास भीड़ नियंत्रित करने के कौन-कौन से विकल्प हैं?
भीड़ को नियंत्रित करने के लिए पुलिस के पास कई विकल्प मौजूद होते हैं।
इनमें शामिल हैं:
- प्रदर्शनकारियों को चेतावनी देना
- भीड़ को पीछे हटने का निर्देश देना
- बैरिकेड का इस्तेमाल
- पानी की बौछार
- आंसू गैस
- सीमित लाठीचार्ज
- अन्य गैर-घातक नियंत्रण उपाय
विभूति नारायण राय के मुताबिक, बल प्रयोग पुलिस की मजबूरी होना चाहिए, न कि ऐसा कदम जिसे उत्तेजना या उत्साह में इस्तेमाल किया जाए।
लाठीचार्ज के तरीके पर भी सवाल
इस मामले में लाठीचार्ज के तरीके को लेकर भी सवाल उठे हैं।
सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने कहा कि लाठीचार्ज का उद्देश्य भीड़ को नियंत्रित करना और उसे तितर-बितर करना होना चाहिए।
उन्होंने दावा किया कि तय नियमों के अनुसार लाठी कमर के ऊपर नहीं मारी जानी चाहिए। लेकिन 20 जुलाई की घटना से सामने आए वीडियो और अन्य सामग्री में कमर के ऊपर और सिर पर लाठी चलाए जाने की बात दिखाई देती है।
उनके अनुसार प्रदर्शनकारियों को पहले स्पष्ट चेतावनी दी जानी चाहिए थी और बातचीत के जरिए स्थिति को संभालने की कोशिश हो सकती थी।
क्या शांतिपूर्ण प्रदर्शन करना नागरिकों का अधिकार है?
इंदिरा जयसिंह ने प्रदर्शन के अधिकार और पुलिस की कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी के बीच संतुलन पर भी सवाल उठाए।
उनके मुताबिक नागरिकों को शांतिपूर्वक और बिना हथियार के एकत्र होने का अधिकार है। साथ ही पुलिस की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखना है।
लेकिन कानून-व्यवस्था बनाए रखने का मतलब यह नहीं है कि पुलिस अपनी इच्छा के अनुसार बल प्रयोग कर सकती है। इसके लिए कानून, पुलिस मैनुअल और तय प्रोटोकॉल मौजूद हैं।
RAF की भूमिका पर क्या सवाल उठे?
पैलेट गन के आरोपों के बीच Rapid Action Force यानी RAF की भूमिका भी चर्चा में आई।
विभूति नारायण राय के मुताबिक RAF की अपनी स्वतंत्र भूमिका नहीं होती। इसे आमतौर पर स्थानीय प्रशासन और पुलिस की मदद के लिए तैनात किया जाता है।
उनका कहना है कि अगर RAF की ओर से पैलेट गन का इस्तेमाल हुआ था, तो इसकी जांच में यह देखना जरूरी होगा कि आदेश किस स्तर से आया था। केवल किसी जवान को जिम्मेदार ठहराना पर्याप्त नहीं होगा।
Face Recognition Technology पर क्यों सवाल उठे?
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान Face Recognition Technology के इस्तेमाल ने भी एक नई बहस शुरू कर दी।
प्रदर्शनकारियों की निगरानी के लिए सर्विलांस वैन और चेहरे की पहचान करने वाली तकनीक के इस्तेमाल की बात सामने आई।
इंदिरा जयसिंह ने इस तकनीक के इस्तेमाल को लेकर कानूनी सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को यह स्पष्ट करना चाहिए कि फेस रिकग्निशन तकनीक का इस्तेमाल किस उद्देश्य से किया गया और इससे जुटाए गए डेटा के साथ क्या किया गया।
Face Recognition से जुड़े डेटा का क्या होगा?
फेस रिकग्निशन तकनीक के इस्तेमाल के साथ सबसे बड़ा सवाल डेटा प्राइवेसी का है।
अगर प्रदर्शन में शामिल लोगों की पहचान तकनीक के जरिए की गई, तो यह जानना महत्वपूर्ण है कि:
- डेटा किस उद्देश्य से इकट्ठा किया गया?
- डेटा कहां स्टोर किया गया?
- इसे कितने समय तक रखा जाएगा?
- किन एजेंसियों को इसकी पहुंच होगी?
- क्या बाद में इस डेटा को हटाया जाएगा?
इंदिरा जयसिंह ने भी इसी तरह के सवाल उठाते हुए डेटा के इस्तेमाल और उसे हटाने की प्रक्रिया को स्पष्ट करने की जरूरत बताई।
क्या प्रदर्शन के दौरान इंटरनेट और मेट्रो सेवाएं भी प्रभावित हुईं?
इस मामले में डिजिटल और सार्वजनिक परिवहन सेवाओं को लेकर भी सवाल उठे।
इंदिरा जयसिंह ने प्रदर्शन के दौरान इंटरनेट बंद होने और मेट्रो कनेक्टिविटी प्रभावित होने की बात का जिक्र किया।
उनके अनुसार जब सरकार के पास कानून और प्रशासनिक ताकत दोनों हों, तब उसकी जवाबदेही और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका क्यों महत्वपूर्ण मानी जा रही है?
इस पूरे मामले में आगे सुप्रीम कोर्ट की भूमिका को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
इंदिरा जयसिंह के अनुसार अगर किसी कार्रवाई को गैरकानूनी माना जाता है तो उसे अदालत के सामने ले जाना जरूरी है। उन्होंने कहा कि अदालत किसी मामले में क्या फैसला देती है, यह अलग विषय है, लेकिन ऐसे मामलों को न्यायिक जांच के लिए अदालत तक पहुंचाना महत्वपूर्ण है।
यही वजह है कि पुलिस कार्रवाई, बल प्रयोग और निगरानी तकनीक के इस्तेमाल से जुड़े सवाल आने वाले समय में कानूनी बहस का हिस्सा बन सकते हैं।
पुलिस कार्रवाई पर उठे सवालों का सार
जंतर-मंतर की घटना को लेकर मुख्य सवाल इन मुद्दों पर केंद्रित हैं:
- क्या प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए इस्तेमाल किया गया बल जरूरी था?
- क्या पैलेट गन या एंटी-रायट गन का इस्तेमाल हुआ?
- लाठीचार्ज तय नियमों के अनुसार किया गया या नहीं?
- पुलिस ने गैर-घातक विकल्पों का पर्याप्त इस्तेमाल किया या नहीं?
- RAF को कार्रवाई का आदेश किस स्तर से मिला?
- Face Recognition Technology का इस्तेमाल किस उद्देश्य से हुआ?
- प्रदर्शनकारियों से जुटाए गए डेटा को कैसे सुरक्षित और इस्तेमाल किया गया?
- क्या कार्रवाई की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए?










