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UP में ₹10 लीटर गोमूत्र खरीदने की योजना, बुलंदशहर से शुरू हुआ पायलट प्रोजेक्ट

On: August 13, 2026 2:38 AM
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यूपी में ₹10 लीटर गोमूत्र
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उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर में गोमूत्र खरीदने का एक नया पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया है। इस योजना के तहत गोमूत्र को ₹10 प्रति लीटर की दर से खरीदा जा रहा है। किसान उत्पादक संगठन (FPO) के माध्यम से शुरू किए गए इस प्रयोग का उद्देश्य गोमूत्र से प्राकृतिक खाद और कीटनाशक तैयार करना, किसानों और पशुपालकों की अतिरिक्त आय बढ़ाना और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना बताया गया है।

फिलहाल यह योजना पूरे उत्तर प्रदेश में लागू नहीं हुई है। इसकी शुरुआत बुलंदशहर की स्याना तहसील के नरसैना गांव से हुई है और आसपास के करीब 15 गांवों को पायलट प्रोजेक्ट से जोड़ा गया है।

हालांकि, योजना शुरू होने के साथ ही इसके उद्देश्य, वैज्ञानिक आधार और राजनीतिक प्रभाव को लेकर सवाल भी उठने लगे हैं।

बुलंदशहर में कैसे शुरू हुआ गोमूत्र खरीदने का प्रयोग?

बुलंदशहर में इस पायलट प्रोजेक्ट को नरसैना ऑर्गेनिक फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड के जरिए संचालित किया जा रहा है। यह संगठन केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के तहत किसान उत्पादक संगठन के रूप में पंजीकृत है।

प्रोजेक्ट की देखरेख किसान उत्पादक संगठन के मुख्य कार्यकारी अधिकारी डॉ. प्रवीण कुमार कर रहे हैं।

प्रोजेक्ट के तहत करीब 15 गांवों को चिह्नित किया गया है। इन गांवों में महिला समूहों के माध्यम से गोमूत्र इकट्ठा किया जा रहा है।

डॉ. प्रवीण कुमार के अनुसार, करीब 300 महिलाएं इस काम से जुड़ी हैं और महिलाएं रोजाना लगभग 8 से 10 लीटर गोमूत्र इकट्ठा कर रही हैं। उनके दावे के मुताबिक, प्रतिदिन करीब 500 लीटर गोमूत्र एकत्र किया जा रहा है।

₹10 प्रति लीटर में खरीदा जा रहा गोमूत्र

इस पायलट प्रोजेक्ट की सबसे ज्यादा चर्चा इसकी खरीद कीमत को लेकर है।

महिला समूहों से ₹10 प्रति लीटर की दर से गोमूत्र खरीदा जा रहा है। इससे ग्रामीण महिलाओं और पशुपालकों के लिए अतिरिक्त आमदनी का जरिया तैयार करने की कोशिश की जा रही है।

अगर किसी महिला समूह से प्रतिदिन 10 लीटर गोमूत्र खरीदा जाता है, तो केवल खरीद के आधार पर ₹100 प्रतिदिन की आय बन सकती है। हालांकि वास्तविक आमदनी व्यक्ति या समूह द्वारा उपलब्ध कराई गई मात्रा पर निर्भर करेगी।

सरकार और प्रोजेक्ट से जुड़े लोगों का कहना है कि इस मॉडल से पशुपालन और प्राकृतिक खेती दोनों को आर्थिक गतिविधि से जोड़ा जा सकता है।

गोमूत्र से कैसे बनाई जा रही खाद और कीटनाशक?

प्रोजेक्ट में गांवों से एकत्र किए गए गोमूत्र को प्लांट तक पहुंचाया जाता है।

इसके बाद गोमूत्र में विभिन्न प्रकार की जड़ी-बूटियां मिलाकर उसे उबाला जाता है। इस प्रक्रिया से लिक्विड, पाउडर और दानेदार खाद तैयार करने की बात कही गई है।

प्रोजेक्ट के लिए करीब 6,000 वर्ग फुट में एक प्लांट किराए पर लिया गया है। यहां पांच तकनीकी कर्मचारियों और करीब 25 श्रमिकों के काम करने की जानकारी दी गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, इन कर्मचारियों में महिलाओं की संख्या अधिक है।

तैयार किए गए उत्पादों को कोऑपरेटिव के माध्यम से बेचने की व्यवस्था की जा रही है।

क्या गोमूत्र से बने कीटनाशक पर वैज्ञानिक शोध हुआ है?

यही इस योजना से जुड़े सबसे महत्वपूर्ण सवालों में से एक है।

प्रोजेक्ट से जुड़े डॉ. प्रवीण कुमार का कहना है कि उन्होंने इस संबंध में शोध किया है। उनके अनुसार, गोमूत्र से तैयार कीटनाशक के इस्तेमाल से पौधों पर लंबे समय तक फंगस नहीं लगने का प्रभाव देखा गया है।

वहीं बांदा कृषि विश्वविद्यालय के वेटेरिनरी एनाटॉमी विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. शैलेन्द्र चौरसिया ने कहा कि विश्वविद्यालय में इस विषय पर शोध नहीं किया गया है। हालांकि, उपलब्ध वैज्ञानिक साहित्य के आधार पर गोमूत्र में जैव-कीटनाशक और फफूंदनाशक उत्पादों के प्राकृतिक घटक के रूप में संभावनाएं होने के संकेत मिलते हैं।

उन्होंने यह भी बताया कि कुछ अध्ययनों में गोमूत्र आधारित वनस्पति फॉर्मूलेशन को नीम और अन्य पौधों के अर्क के साथ इस्तेमाल करने पर कुछ कृषि कीटों और फफूंदजनित रोगों के खिलाफ प्रभाव देखा गया है।

एक उल्लेखित फील्ड अध्ययन में टमाटर के फल छेदक कीट पर लगभग 70 से 80 प्रतिशत नियंत्रण पाए जाने की बात कही गई है। हालांकि इसे व्यापक निष्कर्ष मानने से पहले अलग-अलग परिस्थितियों में वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी होंगे।

सरकार ने इस योजना के बारे में क्या कहा?

उत्तर प्रदेश सरकार के गौसेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता ने इस प्रोजेक्ट को प्राकृतिक खेती और रसायनमुक्त खेती को बढ़ावा देने की दिशा में एक कदम बताया है।

उनके अनुसार, रासायनिक उर्वरकों और दूसरे कृषि इनपुट की लागत तथा उपलब्धता से जुड़ी चुनौतियों को देखते हुए गांवों में उपलब्ध प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल कर जैविक खाद और प्राकृतिक कीटनाशक तैयार करने पर काम किया जा रहा है।

उन्होंने गुजरात के बनासकांठा में चल रहे एक गोमूत्र आधारित प्रयोग का भी उदाहरण दिया, जहां बड़े स्तर पर गोमूत्र संग्रह और कीटनाशक निर्माण की बात कही गई है।

तैयार उत्पाद कहां बेचे जा रहे हैं?

पायलट प्रोजेक्ट में तैयार खाद और कीटनाशकों की बिक्री कोऑपरेटिव के माध्यम से की जा रही है।

इस मॉडल का उद्देश्य केवल गोमूत्र खरीदना नहीं बल्कि उससे मूल्यवर्धित कृषि उत्पाद तैयार करना है। यानी गांव से कच्चा संसाधन एकत्र करके उसे प्रोसेस किया जाए और फिर तैयार उत्पाद के रूप में बाजार में बेचा जाए।

इससे योजना को ग्रामीण रोजगार, महिला आय और प्राकृतिक खेती से जोड़ने की कोशिश की जा रही है।

हालांकि, इस मॉडल की वास्तविक आर्थिक सफलता का आकलन लंबे समय तक उत्पादन, बिक्री, लागत और किसानों द्वारा उत्पादों के इस्तेमाल के परिणामों के आधार पर ही किया जा सकेगा।

छत्तीसगढ़ में पहले भी हो चुकी है गोमूत्र की खरीद

उत्तर प्रदेश से पहले छत्तीसगढ़ में भी गोमूत्र खरीदने की योजना शुरू हो चुकी है।

जुलाई 2022 में तत्कालीन छत्तीसगढ़ सरकार ने गोमूत्र की खरीद शुरू की थी। वहां गोमूत्र के लिए ₹4 प्रति लीटर की दर निर्धारित की गई थी। योजना की शुरुआत महिलाओं के एक स्व-सहायता समूह से गोमूत्र खरीदकर की गई थी।

छत्तीसगढ़ में गोमूत्र के साथ-साथ गोबर खरीदने की योजना भी पहले से संचालित थी। इन संसाधनों से जैविक खाद और कीटनाशक तैयार करने की कोशिश की गई थी।

रिपोर्ट के अनुसार, छत्तीसगढ़ के बाद झारखंड और मध्य प्रदेश समेत कुछ अन्य राज्यों ने भी गोबर खरीदने से जुड़ी योजनाएं शुरू कीं।

समाजवादी पार्टी ने योजना पर उठाए सवाल

बुलंदशहर में शुरू हुए इस पायलट प्रोजेक्ट पर राजनीतिक विवाद भी सामने आया है।

समाजवादी पार्टी ने इसे ध्यान भटकाने वाली पहल बताया है। पार्टी के प्रदेश प्रवक्ता फखरुल हसन चांद ने सरकार पर गाय के नाम पर लोगों को गुमराह करने का आरोप लगाया। उन्होंने राज्य में किसानों से जुड़ी दूसरी समस्याओं, खासकर आलू की कीमत, का मुद्दा भी उठाया।

समाजवादी पार्टी ने इस योजना को आगामी विधानसभा चुनावों से भी जोड़कर देखा है।

हालांकि, यह पार्टी का राजनीतिक आरोप है और इसे योजना के उद्देश्य या सरकारी नीति की स्वतंत्र पुष्टि के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

बीजेपी ने क्या जवाब दिया?

बीजेपी के प्रदेश प्रवक्ता आनंद दुबे ने समाजवादी पार्टी के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि विपक्ष नए प्रयोगों का विरोध करता है।

उनके अनुसार, सरकार का उद्देश्य किसानों को सशक्त बनाना, गोपालन को बढ़ावा देना, रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करना और कम लागत में अधिक उत्पादन की दिशा में काम करना है।

इस तरह गोमूत्र खरीद योजना को लेकर राजनीतिक दलों के बीच अलग-अलग दावे सामने आए हैं।

₹10 लीटर गोमूत्र खरीद योजना का असली उद्देश्य क्या है?

इस पायलट प्रोजेक्ट के पीछे मुख्य रूप से चार उद्देश्य बताए जा रहे हैं—

  1. किसानों और पशुपालकों को अतिरिक्त आय देना
  2. ग्रामीण महिलाओं के लिए रोजगार का अवसर पैदा करना
  3. गोमूत्र से प्राकृतिक खाद और कीटनाशक बनाना
  4. प्राकृतिक और कम रसायन वाली खेती को बढ़ावा देना

हालांकि, इन उद्देश्यों को बड़े स्तर पर सफल बनाने के लिए उत्पाद की गुणवत्ता, वैज्ञानिक प्रभावशीलता, लागत और बाजार में मांग जैसे पहलुओं का भी परीक्षण जरूरी होगा।

क्या पूरे यूपी में लागू होगी ₹10 लीटर गोमूत्र योजना?

फिलहाल ऐसा नहीं है।

उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ₹10 प्रति लीटर गोमूत्र खरीदने की योजना अभी बुलंदशहर में पायलट प्रोजेक्ट के रूप में चल रही है। इसे पूरे उत्तर प्रदेश में लागू किए जाने की पुष्टि स्रोत में नहीं है। इसकी शुरुआत नरसैना गांव और आसपास के करीब 15 गांवों से हुई है।

इसलिए सोशल मीडिया या अन्य माध्यमों पर इसे पूरे उत्तर प्रदेश में लागू योजना के रूप में पेश करना फिलहाल सही नहीं होगा।

आगे क्या होगा?

बुलंदशहर का यह प्रयोग आने वाले समय में कई स्तरों पर महत्वपूर्ण हो सकता है।

यदि गोमूत्र से तैयार उत्पादों की गुणवत्ता, कृषि उपयोगिता और बाजार में मांग साबित होती है, तो इस तरह के मॉडल को अन्य क्षेत्रों में भी बढ़ाया जा सकता है।

दूसरी ओर, यदि उत्पादों की लागत अधिक रहती है या किसानों को अपेक्षित परिणाम नहीं मिलते, तो योजना के बड़े स्तर पर विस्तार में चुनौतियां आ सकती हैं।

फिलहाल यह एक पायलट प्रोजेक्ट है और इसके वास्तविक परिणाम आने में समय लगेगा।

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