Justice Yashwant Varma Cash Case: जस्टिस यशवंत वर्मा से जुड़े कैश मामले में बड़ी जानकारी सामने आई है। लोकसभा अध्यक्ष की ओर से उनके सरकारी आवास के परिसर में नकदी मिलने के आरोपों की जांच के लिए बनाई गई तीन सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश कर दी है।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि जस्टिस वर्मा के खिलाफ बिना हिसाब वाली नकदी, महत्वपूर्ण सबूतों से छेड़छाड़ और नकदी के बारे में संतोषजनक जवाब नहीं देने से जुड़े आरोप साबित होते हैं।
यह जांच जजेज़ (इंक्वायरी) एक्ट के तहत गठित तीन सदस्यीय समिति ने की थी। समिति ने खास तौर पर सरकारी आवास के स्टोर रूम में मिली नकदी, उसके स्रोत और उस स्थान पर मौजूद सबूतों की स्थिति की जांच की।
जस्टिस यशवंत वर्मा कैश केस क्या है?
यह मामला मार्च 2025 में सामने आया था।
14 मार्च को दिल्ली हाई कोर्ट के तत्कालीन जज जस्टिस यशवंत वर्मा के नई दिल्ली स्थित सरकारी आवास के एक स्टोर रूम में आग लगने की घटना हुई थी। इसके बाद वहां कथित तौर पर बड़ी मात्रा में नकदी मिलने की जानकारी सामने आई।
22 मार्च को सुप्रीम कोर्ट की ओर से इस मामले से जुड़ी रिपोर्ट सार्वजनिक की गई थी। उसमें दिल्ली पुलिस की कुछ तस्वीरें और वीडियो भी शामिल थे, जिनमें जले हुए नोट दिखाई दे रहे थे। हालांकि, रिपोर्ट के कुछ हिस्से सार्वजनिक नहीं किए गए थे।
मामला सामने आने के बाद जस्टिस वर्मा के खिलाफ जांच शुरू हुई और उनसे नकदी के स्रोत तथा स्टोर रूम में पैसे मौजूद होने को लेकर जवाब मांगा गया।
जांच समिति ने रिपोर्ट में क्या कहा?
लोकसभा अध्यक्ष की ओर से गठित तीन सदस्यीय समिति ने अपनी रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगाए गए आरोपों पर निष्कर्ष दिया।
समिति के अनुसार, जस्टिस वर्मा अपने सरकारी आवास के स्टोर रूम में मिली नकदी की मौजूदगी, स्रोत और मालिकाना हक को लेकर संतोषजनक स्पष्टीकरण देने में नाकाम रहे।
समिति ने यह भी कहा कि महत्वपूर्ण सबूतों को सुरक्षित नहीं रखा गया और स्टोर रूम की स्थिति कानूनी तरीके से सील तथा निरीक्षण किए जाने से पहले बदल गई थी।
रिपोर्ट दो हिस्सों में तैयार की गई है। इसमें जांच के दौरान दर्ज किए गए मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों को शामिल किया गया है। समिति ने मई में अपनी रिपोर्ट लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सौंप दी थी।
स्टोर रूम में कितनी नकदी मिली थी?
समिति की रिपोर्ट में यह कहा गया है कि 14-15 मार्च 2025 को आग लगने के बाद स्टोर रूम में 500 रुपये के नोट बड़ी मात्रा में मौजूद थे।
गवाहों ने इन नोटों को जले, आधे जले, गीले और बिखरे हुए नोटों के बंडल, ढेर और गड्डियों के रूप में देखा था। दिल्ली फायर सर्विस और पुलिस के कई कर्मचारियों ने भी नोटों को देखने की बात कही।
हालांकि, समिति के अनुसार कुल कितनी नकदी वहां मौजूद थी, इसका सटीक निर्धारण करना संभव नहीं था क्योंकि नोटों को सुरक्षित तरीके से संरक्षित नहीं किया गया था।
समिति ने नकदी के मालिकाना हक को लेकर क्या कहा?
समिति ने कहा कि सरकारी आवास के परिसर में बड़ी मात्रा में ऐसी नकदी मिली जिसका संतोषजनक हिसाब नहीं दिया गया।
रिपोर्ट के अनुसार, स्टोर रूम जज के सरकारी आवास का हिस्सा था और उस परिसर पर जस्टिस वर्मा का नियंत्रण था। समिति ने इसी आधार पर कहा कि नकदी की मौजूदगी, उसके स्रोत और मालिकाना हक को लेकर संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया।
यहां यह अंतर समझना जरूरी है कि समिति का निष्कर्ष जांच प्रक्रिया के आधार पर है। रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा के अपने बचाव और उनके द्वारा लगाए गए साजिश के आरोपों का भी उल्लेख है।
आग लगने के बाद क्या हुआ था?
दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय की रिपोर्ट के मुताबिक, 15 मार्च को उन्हें दिल्ली पुलिस कमिश्नर का फोन आया और जस्टिस वर्मा के घर में लगी आग की जानकारी दी गई।
इसके बाद उन्होंने मामले की जानकारी सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस संजीव खन्ना को दी।
रिपोर्ट के मुताबिक, जस्टिस वर्मा के घर पर तैनात सुरक्षा गार्ड ने बताया था कि 15 मार्च की सुबह स्टोर रूम से कुछ जली हुई चीजें हटाई गई थीं। इसके बाद चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय ने अपने सचिव को जस्टिस वर्मा के आवास की जांच के लिए भेजा।
पुलिस की कुछ रिपोर्टों में स्टोर रूम में 4-5 अधजली बोरियों में कैश मिलने का उल्लेख भी किया गया था।
जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने बचाव में क्या कहा?
जस्टिस यशवंत वर्मा ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों से इनकार किया था।
उनका कहना था कि जब आग लगी, तब वह मध्य प्रदेश में थे और 15 मार्च की शाम को दिल्ली लौटे। उनके मुताबिक आग लगने के समय उनकी बेटी और स्टाफ घर पर मौजूद थे, लेकिन आग बुझने के बाद उन्होंने स्टोर रूम में कोई कैश नहीं देखा।
उन्होंने कहा कि उन्हें जले हुए कैश के बारे में पहली बार तब पता चला जब दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने उन्हें वीडियो दिखाया।
जस्टिस वर्मा ने यह भी कहा कि उन्होंने या उनके परिवार ने कभी उस स्टोर रूम में कैश नहीं रखा और वहां मिला कथित कैश उनका नहीं था।
जस्टिस वर्मा ने इसे साजिश क्यों बताया?
अपने बचाव में जस्टिस वर्मा ने कहा था कि उनके खिलाफ साजिश रची जा रही है।
उन्होंने सवाल उठाया था कि कोई व्यक्ति ऐसे स्टोर रूम में नकदी क्यों रखेगा, जहां अन्य लोग भी पहुंच सकते हैं।
उनके अनुसार, वह नकदी केवल बैंक से निकालते हैं और उनके पास अपने वित्तीय लेनदेन से जुड़े दस्तावेज मौजूद हैं। उन्होंने यह भी कहा कि स्टोर रूम उनके रहने वाले हिस्से से अलग था।
उन्होंने यह भी दावा किया कि उन्हें कथित कैश दिखाया या सौंपा नहीं गया और उनके स्टाफ ने भी स्टोर रूम से कोई कैश हटाने की बात से इनकार किया।
जस्टिस वर्मा ने पूरे मामले को अपने खिलाफ साजिश बताते हुए कहा था कि इससे उनकी वर्षों में बनी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचा।
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में क्या किया था?
मामला सामने आने के बाद सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन चीफ जस्टिस संजीव खन्ना ने जांच की प्रक्रिया शुरू कराई।
दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस डीके उपाध्याय से प्रारंभिक जांच कराई गई। उनकी रिपोर्ट में मामले में गहरी जांच की जरूरत बताई गई थी।
इसके बाद तीन जजों की समिति गठित की गई। साथ ही जस्टिस यशवंत वर्मा को कुछ समय के लिए न्यायिक जिम्मेदारी नहीं देने का फैसला किया गया।
जस्टिस वर्मा को इलाहाबाद हाई कोर्ट भेजने का प्रस्ताव
सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम ने जस्टिस यशवंत वर्मा को दिल्ली से हटाकर वापस इलाहाबाद हाई कोर्ट भेजने का प्रस्ताव भी दिया था।
हालांकि, इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन ने इस फैसले पर आपत्ति जताई थी।
जस्टिस वर्मा का इलाहाबाद हाई कोर्ट से पुराना संबंध रहा है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, उनका जन्म 6 जनवरी 1969 को इलाहाबाद यानी वर्तमान प्रयागराज में हुआ था और वह तीन दशक से अधिक समय तक कानूनी पेशे से जुड़े रहे।
संसद में जस्टिस वर्मा के खिलाफ क्या हुआ?
रिपोर्ट के अनुसार, करीब 200 सांसदों ने संसद के माध्यम से जस्टिस वर्मा को पद से हटाने की मांग की थी।
इसके बाद जस्टिस यशवंत वर्मा ने इस्तीफा दे दिया।
अब जांच समिति की रिपोर्ट संसद के दोनों सदनों में पेश किए जाने के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में है।
समिति की रिपोर्ट क्यों महत्वपूर्ण है?
इस रिपोर्ट का महत्व इसलिए है क्योंकि समिति ने केवल नकदी मिलने की घटना का उल्लेख नहीं किया, बल्कि नकदी के स्रोत, उसके मालिकाना हक और सबूतों के संरक्षण जैसे सवालों पर भी निष्कर्ष दिया है।
समिति ने कहा कि:
- सरकारी आवास के स्टोर रूम में बड़ी मात्रा में नकदी मौजूद थी।
- नकदी का संतोषजनक हिसाब नहीं दिया गया।
- नकदी के स्रोत और मालिकाना हक को लेकर पर्याप्त जवाब नहीं मिला।
- महत्वपूर्ण सबूतों को सुरक्षित नहीं रखा गया।
- निरीक्षण और सीलिंग से पहले स्टोर रूम की स्थिति बदली गई।
यही बिंदु समिति की रिपोर्ट को इस मामले में महत्वपूर्ण बनाते हैं।
अभी इस मामले में आगे क्या?
अब संसद में समिति की रिपोर्ट पेश हो चुकी है। रिपोर्ट में जस्टिस वर्मा के खिलाफ आरोपों को साबित बताया गया है।
हालांकि, इस पूरे मामले की संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया को उसके अगले चरणों में देखा जाना बाकी है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच समिति की रिपोर्ट और किसी व्यक्ति के खिलाफ अंतिम कानूनी कार्रवाई एक ही चीज नहीं होती। आगे की प्रक्रिया संबंधित संवैधानिक और संसदीय प्रावधानों के अनुसार तय होगी।
इसलिए फिलहाल इस मामले को समिति की जांच के निष्कर्षों के संदर्भ में समझना उचित है।










