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BRICS Summit 2026: क्या भारत-रूस-चीन डॉलर का दबदबा कम कर पाएंगे?

On: September 10, 2026 6:07 AM
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BRICS Summit 2026
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BRICS Summit 2026: नई दिल्ली में होने वाले 18वें BRICS शिखर सम्मेलन पर पूरी दुनिया की नजर है। भारत की मेजबानी में होने वाली इस बैठक में अमेरिकी डॉलर पर निर्भरता कम करने, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने और एनर्जी सिक्योरिटी जैसे मुद्दों पर चर्चा अहम रहने की उम्मीद है।

BRICS Summit 2026 कब और कहां होगा?

इस बार BRICS Summit का आयोजन नई दिल्ली के भारत मंडपम में 12 और 13 सितंबर 2026 को किया जा रहा है। सम्मेलन का एक प्रमुख एजेंडा अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर की निर्भरता कम करना और स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ावा देना है।

मध्य-पूर्व में जारी तनाव और वैश्विक सप्लाई चेन से जुड़ी चुनौतियों के बीच एनर्जी सिक्योरिटी भी महत्वपूर्ण विषय रहने वाली है।

BRICS क्या है?

BRICS उभरती अर्थव्यवस्थाओं का एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है। इसकी शुरुआत ब्राजील, रूस, भारत और चीन यानी BRIC के रूप में हुई थी। 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद इसका नाम BRICS हुआ।

बाद में संगठन का विस्तार हुआ और मिस्र, इथियोपिया, ईरान, इंडोनेशिया, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश भी इसमें शामिल हुए।

BRICS का उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आर्थिक सहयोग बढ़ाना, व्यापार को आसान बनाना और वैश्विक मंच पर विकासशील देशों की भूमिका मजबूत करना है। संगठन वैश्विक आबादी के करीब 45% और वैश्विक GDP के 30% से ज्यादा का प्रतिनिधित्व करता है।

डॉलर की जगह स्थानीय करेंसी में व्यापार पर जोर

BRICS देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की कोशिश पिछले कुछ वर्षों में तेज हुई है। चीन और रूस के बीच व्यापार में युआन और रूबल का इस्तेमाल इसका प्रमुख उदाहरण है।

हालांकि, स्थानीय करेंसी में व्यापार करना हर स्थिति में आसान नहीं है। अगर दो देशों के बीच आयात और निर्यात में बड़ा अंतर हो, तो भुगतान की मुद्रा को लेकर समस्या पैदा हो सकती है।

भारत और रूस का व्यापार इसका उदाहरण है। भारत रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता है, जबकि रूस को भारत से उतना सामान नहीं बेचता। ऐसे में रुपये में भुगतान बढ़ने पर रूस के पास बड़ी मात्रा में भारतीय मुद्रा जमा हो सकती है, जिसका इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर करना आसान नहीं है।

क्या BRICS डॉलर को खत्म कर सकता है?

BRICS देशों की कोशिश डॉलर पर निर्भरता कम करने की है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि अमेरिकी डॉलर तुरंत वैश्विक व्यापार से बाहर हो जाएगा।

स्थानीय मुद्राओं में द्विपक्षीय व्यापार बढ़ रहा है, लेकिन वैश्विक स्तर पर डॉलर की भूमिका अभी भी बेहद मजबूत है। इसलिए फिलहाल ज्यादा सही तस्वीर यह है कि BRICS देश डॉलर का विकल्प तैयार करने और भुगतान के दूसरे रास्ते विकसित करने की कोशिश कर रहे हैं, न कि तत्काल डॉलर को खत्म करने की।

रूस और चीन के बीच बढ़ा नॉन-डॉलर ट्रेड

पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए प्रतिबंधों के बाद रूस और चीन के बीच स्थानीय मुद्राओं में व्यापार तेजी से बढ़ा है।

BRICS के भीतर भी स्थानीय करेंसी में व्यापार का इस्तेमाल बढ़ा है। भारत ने भी कई देशों को भारतीय रुपये में व्यापार के लिए विशेष वोस्ट्रो खाते खोलने की अनुमति दी है।

हालांकि, स्थानीय करेंसी के इस्तेमाल में एक बड़ी चुनौती करेंसी रिस्क है। यदि किसी देश की मुद्रा में अचानक बड़ी गिरावट आती है, तो दूसरे देश को वित्तीय नुकसान उठाना पड़ सकता है।

भारत रुपये में किन देशों के साथ व्यापार कर रहा है?

खबर के मुताबिक, RBI ने 22 देशों के 100 से अधिक बैंकों को भारत में Special Rupee Vostro Accounts खोलने की अनुमति दी है।

इन देशों में रूस, UAE, सिंगापुर, श्रीलंका, मॉरीशस, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, मलेशिया और ओमान समेत कुछ अफ्रीकी देश शामिल हैं।

नेपाल और भूटान के साथ भारत का व्यापार लंबे समय से रुपये में होता रहा है, जबकि UAE और मलेशिया के साथ भी रुपये-दिरहम और रुपये-रिंगिट जैसे विकल्पों में व्यापार बढ़ा है।

अमेरिका के लिए क्यों बढ़ सकती है चुनौती?

अगर ज्यादा देश डॉलर के बजाय अपनी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार करने लगते हैं, तो अमेरिका की वित्तीय ताकत पर इसका दीर्घकालिक असर पड़ सकता है।

अमेरिकी डॉलर के प्रभुत्व की वजह से अमेरिका को अंतरराष्ट्रीय वित्तीय व्यवस्था में बड़ा फायदा मिलता है। डॉलर की मांग में बड़ी कमी आने पर अमेरिकी अर्थव्यवस्था को महंगाई और ब्याज दरों से जुड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है।

हालांकि, डॉलर का प्रभुत्व रातों-रात खत्म होना मुश्किल है। इसकी वजह अमेरिकी अर्थव्यवस्था का आकार, डॉलर की वैश्विक स्वीकार्यता और अंतरराष्ट्रीय कमोडिटी ट्रेड में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है।

BRICS के लिए सबसे बड़ी चुनौती क्या है?

स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने के बावजूद BRICS के सामने कई व्यावहारिक चुनौतियां हैं।

  • अलग-अलग देशों की मुद्राओं में उतार-चढ़ाव
  • देशों के बीच व्यापार असंतुलन
  • भुगतान और वित्तीय सिस्टम को आपस में जोड़ना
  • डॉलर की वैश्विक स्वीकार्यता
  • युआन और अन्य मुद्राओं पर अंतरराष्ट्रीय भरोसा

इसलिए BRICS के लिए सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या स्थानीय मुद्राओं में बढ़ता द्विपक्षीय व्यापार आगे चलकर एक मजबूत वैकल्पिक वैश्विक भुगतान व्यवस्था में बदल सकता है।

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